महिलाएं विनाश को पलट सकती हैं

हम काफी समय से यह सुनते आ रहे हैं कि महिलाएं कमजोर होती हैं। इसके बावजूद हर युग में साहसी महिलाओं का अस्तित्व रहा है जो क्रांति की शुरुआत करने के लिए पुरुष समाज द्वारा बनाए गए पिंजरों को तोड़कर बाहर आई हैं। भारत में ही कई साहसी महिलाएं रह चुकी हैं जैसे कि, रानी पद्मावती, हाथी रानी, मीराबाई और झांसी की रानी। इनमें से कोई भी महिला कमजोर नहीं थी। ये सभी वीरता, शौर्यता और पवित्रता की अवतार थीं। इनके समान ही कई नारियों का अस्तित्व दूसरे देशों में भी रहा है। उदाहरण के तौर पर फ्लोरेंस नाईटिंगल, जॉन ऑफ आर्क और हेरिएट टबमेन का नाम लिया जा सकता है। वास्तव में पुरुष को खुद को ना तो रक्षक और ना ही सजा देने वाली की स्थिति में रखना चाहिए। उनका साथ औरतों के प्रति तत्परता और ग्रहणशीलता का होना चाहिए जिससे महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में अगुआ की भूमिका मिल सके। कई लोग पूछते हैं, “इस बात के लिए पुरुषों में अहंकार कैसे आया?” वेदांत के अनुसार इसका मुख्य कारण माया हो सकती है लेकिन केवल आधारभूत स्तर पर। इसका कोई दूसरा स्रोत भी हो सकता है। प्राचीन समय में मानव जाति जंगलों में, गुफाओं में या पेड़ पर घर बनाकर रहते थे। चूंकि पुरुष शारीरिक रूप से महिलाओं से अधिक बलवान थे, इसलिए शिकार और जंगली जानवरों से परिवार को बचाने की जिम्मेदारी उनकी होती थी। महिलाएं मुख्य रूप से घर पर रहकर बच्चों की देखभाल और घर के काम-काज करती थीं। पुरुष घर पर भोजन और पहनने के लिए जानवर की खाल लाते थे। इस अनुसार उन्होंने खुद ही यह विचारधारा विकसित कर ली कि जीविका के लिए औरतें उनपर निर्भर हैं और वे मालिक और औरतें नौकर हैं। इस तरह से औरतों ने भी पुरुषों को अपने रक्षक की तरह देखना शुरु कर दिया। शायद इसी तरह इस अहंकार का विकास हुआ होगा। औरतें कमजोर नहीं हैं और उन्हें कमजोर मानना भी नहीं चाहिए। लेकिन उनके स्वाभाविक करुणा और सहानुभूति की अक्सर गलत तरीके से व्याख्या की जाती है और इसे उनकी कमजोरी समझा जाता है। अगर औरतें अपने भीतर की ताकत को समेट ले तो वो एक पुरुष से भी ज्यादा है। पुरुष समाज को ईमानदारी से उनकी इस अव्यक्त शक्ति को समझने में और महसूस करने में मदद करनी चाहिए। अगर हम अपनी आंतरिक शक्ति को अपने पक्ष में कर लें तो यह संसार स्वर्ग बन सकता है। युद्ध, संघर्ष और आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्यार और करुणा जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाएगा। एक बार एक अफ्रीकन देश में युद्ध की घटना हुई। इस युद्ध में अनगिनत पुरुष मारे गये। औरतों की आबादी 70 प्रतिशत की हो गई लेकिन इस नुकसान से उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं खोई। वो मिलकर एक हो गईं। व्यक्तिगत स्तर पर और समूह में उन्होंने छोटा-छोटा व्यापार करना शुरु कर दिया। उन्होंने अपने बच्चों और अनाथ बच्चों दोनों का पालन-पोषण करना शुरु कर दिया। जल्द ही उन्होंने खुद की स्थिति को शसक्त और बेहतर पाया। यह प्रमाणित करता है कि महिलाएं विनाश को पलट सकती हैं और गंभीरता के साथ विचार कर एक शक्ति बन सकती है। इस तरह की घटना के कारण ही लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं, “अगर औरतें शासन करती हैं तो कई लड़ाईयों और दंगों को टाला जा सकता है। एक औरत सावधानी के साथ सोच-विचारकर ही किसी को मरने के लिए किसी को युद्ध में भेजेगी। और ऐसे में केवल एक औरत ही दूसरी औरत के औलाद के मरने का दुख समझ सकती है।” अगर औरतें एकजुट हों जाएं तो एक साथ मिलकर वो कई आश्चर्यजनक बदलाव इस समाज में ला सकती हैं। लेकिन पुरुषों को भी उन्हें एक साथ लाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। समाज को बचाने के लिए औरतों और पुरुषों को अपना हाथ मिलाना होगा। केवल तभी आने वाली पीढ़ी एक बड़ी आपदा से बच पायेगी। अगर वो हाथ मिलाते हैं तो इससे समाज और दुनिया की तरक्की होगी। हम सबों को इस लक्ष्य को पाने के लिए काम करना चाहिए।.

ये लक्षण बताते हैं कि आपका बचपन भी डर के साए में बीता है

1-बच्चों की परवरिश

दुनिया के हर हिस्से में अलग-अलग धर्म और मान्यताओं को मानने वाले लोग रहते हैं। रीति-रिवाज़ चाहें कितने ही अलग क्यों ना हों लेकिन कुछ मामलों में लोग अलग नहीं होते। हम बात कर रहे हैं बच्चों की परवरिश की। जिसका तरीका लगभग हर माता-पिता का एक सा ही होता है। बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी के मायने सिर्फ भावुकता तक ही सीमित नहीं हैं। यह अभिभावकों और परिवार के सदस्यों की जैविक जिम्मेदारी भी है जिसके दायरे में वो बच्चों को सुरक्षित वातावरण दे सकें। लेकिन हर अभिभावक ऐसा करने में सफल नहीं हो पाता क्योंकि या तो उन्हें ऐसी परवरिश का ज्ञान नहीं होता या वो बच्चों की परवरिश को बहुत हल्के में लेकर इसे नजरअंदाज करते हैं। ऐसा होने पर कई बच्चों का बचपन बहुत दर्द भरा और डर के साए में गुजरता है।
2-असुरक्षा की भावना

आप सोच रहे होंगे कि कौन सा अभिभावक अपने बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं लेता है? सुरक्षा का अर्थ सिर्फ शारीरिक सुरक्षा से नहीं है और ना ही उन्हें अच्छा खाना देने या अच्छे कपड़े पहनाने से है। सुरक्षा का दायरा इससे कहीं ज्यादा बड़ा है जहां भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक समर्थन की जरूरत पड़ती है जो हमें एक अच्छा इंसान बनने में मदद करता है।

3-क्या होता है जब बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं?

यह एक बड़ा सवाल है क्योंकि बच्चों का मानसिक स्तर इतना बड़ा नहीं होता कि वह अपनी उलझन और परेशानी का हल खोज पाएं। वो भी तब जब उन्हें दर्द महसूस हो रहा हो। पहचानना तब ज्यादा मुश्किल हो जाता है जब डर और दर्द की यह भावना लगातार कई सालों से बच्चे के दिल में घर कर जाता है। बच्चे जब असुरक्षित महसूस करते हैं और उन्हें इसका हल नहीं मिल पाात तो यह भावना उनके मानसिक स्वास्थ्य को खराब करती है।

4-क्या होता है जब बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं?

यही बचपन का घाव बड़े होने पर हमारे मन पर प्रभाव डालने लगता है। कई अभिभावक इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि उन्हें बच्चों का वो डर बहुत सामान्य लगता है। आइए जानते हैं कि आखिर यह डर क्या है जो धीरे-धीरे बचपन के जख्म बनकर भविष्य को प्रभावित करने लगता है।

5- इनर चाइल्ड क्या है?

आपने यह शब्द कई बार सुना होगा लेकिन क्या आपको इसका अर्थ पता है? इनर चाइल्ड का अर्थ है, बचपन की वो यादें, वो भावनात्मक लगाव जो ताउम्र हमारे मानस (साइकी) से जुड़ा होता है। इनर चाइल्ड से जुड़ा रहना हमारी मानसिक सेहत के लिए बहुत जरूर है क्योंकि यह हमारे अंदर मौजूद बच्चे को हमेशा जिंदा रखता है। जब हम अपने इनर चाइल्ड से जुड़े रहते हैं तो हम उत्साह, प्रेरणा और स्फूर्ति से भरे रहते हैं लेकिन जब हम इससे अलग हो जाते हैं तो आलस, निराश और दुखी रहने लगते हैं। जैसे कि हम अंदर से खाली हों।

6- सुरक्षा के मायने

जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया था कि सुरक्षा का अर्थ सिर्फ शारीरिक या आर्थिक सुरक्षा से नहीं है। बच्चे परिवार में तब सुरक्षित महसूस करते हैं जब उन्हें अपनाया जाता है। जब बच्चे खुद को पहचान पाएं, या वैसा रहें जैसे वो हैं। कई माता-पिता अपने बच्चों की राय जाने बिना, उन्हें परखे बिना उन्हें अपने फ्रेम के अनुसार बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में बच्चे बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं। उन्हें खुलकर बोलने का और अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करने का मौका ही नहीं मिलता है। ऐसे हालात में वो अपने परिवार के लोगों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं और असुरक्षा की भावना से घिर जाते हैं। यही असुरक्षा की भावना उनके साथ उम्रभर रहती है जो उन्हें मानसिक तौर पर कमजोर बनाती है। आपमें से कई लोग ऐसे होंगे जिनका बचपन कुछ ऐसा ही बीता होगा। ऐसे लोग फैसले लेने में कमजोर होते हैं और बड़े होने के बावजूद अपने फैसले खुद नहीं ले पाते। ऐसे बच्चे अपने इनर चाइल्ड को कहीं दबा देते हैं और वो जीवन जी रहे होते हैं जिसकी उन्होंने कल्पना नहीं की होती है।
7- 10 कारण जब बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं

1. बच्चों को बताया जाना कि किसी भी विषय में उनका मत ना होना एक अच्छी बात है।
2. जब भी बच्चे कुछ नया करना चाहें या अपनी बात परिवार के सामने खुलकर बोलें तो उन्हें सज़ा मिले।
3. बच्चों को खेलने या फन करने पर हतोत्साहित किया जाए। 4. किसी भी बात पर बच्चों के फौरन प्रतिक्रिया देने को गलत माना जाए।
5. गुस्सा या अत्यधिक खुशी जाहिर करने पर पाबंदी।
6. परिवार या अभिभावकों द्वारा बार-बार बेइज्जती किया जाना।
7. बार-बार वर्बल अब्यूज़ या नीचा दिखाया जाना।
8. शारीरिक रूप से सज़ा मिलना, जैसे बांधना, पीटना।
9. अभिभावकों की खुशी का जिम्मेदार बनाया जाना।
10. प्यार की कमी, जैसे- हग, किस या प्यार से अपने पास बैठा लेना।

अहंकार से अहं की आभाव तक

अहंभाव सिर्फ वह नही है

जो व्यवहार मे व्यक्त हो जाए !

अहंभाव वह भी है जो अव्यक्त हो

और जो अहं का भाव से शुरु होकर

मन मे क्लेश, क्रोध, भय, ईर्षा आदि पैदा करता हो!

जो कोई किसी से बुरे बरताव करे

वह तो अहंभाव से घिरा है ही!

पर वह व्यक्ति भी अहंकार का ही शिकार है

जो दुख, ईर्षा, भय, क्रोध के अंधकार मे खो गया हो!

ऐसे मे व्यक्ति अपने से ही अपने आप को दूर करे

अपने अंदर ही अंदर घुट जाये!

और वे सब कुछ मन मे ही दफना दे

जो तनाव के माध्यम बनें!

और फिर वह खुद को ही उतना ही नुकसान पहुँचा दे

जैसे फीता कृमि करें

शरीर मे प्रवेश करके!

और आदमी अंदर से खोखला होता जाये!

यह अवस्था एसा दलदल है

जिस मे अकसर हम गिर पड़ते हैं!

और यह दलदल एसा है

कि कोई भी हमें बचा न पायेंगे

सिवा गुरु के !

या सिवा कोई एसा व्यक्ति या अद्भुत घटना के

जो वह अंदरज्योति को जलाये!

जो हमे एक ही पल मे जाग्रत कर दे!

और अहंकार को अहं की आभाव मे बदले!

तो वह बेहद खुशकिस्मत है

जो यह ग्यान पाये

कि अहंकार ही दुख क्रोध आदि का कारण है

दूसरे सिर्फ़ माध्यम हैं!

‘सो हं सो हं’ से मन हुआ रोशन!

ओर मिठे सारे अंधकार धीरे धीरे!

जो विचार बुद्धि और भाव को मैले किये

और फिर गूँज उठे ‘सो हं सो हं’ का अनहद नाद

हर जगह हर पल जीवन मे!

(गलतियां माफ करें)

मृत्यु की गोद

मित्रों को नरेन्द्र ने एक सवाल पूछा कि जब हमारा या किसी अन्य जीव का जन्म होता है तो सबसे पहले उन्हें कौन अपनी गोद में लेता है ?

जबाब जो मिले वो स्वाभाविक थे, किसी ने कहा जीव की माता या फिर डाक्टर, नर्स इत्यादि । सुनने में ये जबाब एकदम सही है और प्रामाणिक भी ।

फिर नरेन्द्र ने पूछा कि यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो इसका जबाब क्या होगा ? अब पेंच फँस गया कि आध्यात्मिक दृष्टि भला क्या है ? चूंकि हर शब्द एक भाषा से जुड़ा होता है और सामान्यतः भाषा को धर्म से जोड़कर देखने की परम्परा रही है तो ये सवाल और भी पेचीदा हो गया । मित्रों को ज्यादा न उलझाते हुए नरेंद्र ने कहा “मृत्यु” । मृत्यु ही जीव का जन्म होते ही उसे सर्वप्रथम अपनी गोद में लेती है यानि जो जीव पैदा हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। नरेंद्र कहता है कि उसे याद है जब वो अपने एक मित्र के घर जाता था तो प्रवेश द्वार पर लिखा होता था सावधान मृत्यु प्रतिक्षण आपके नजदीक आ रही है।

चूँकि मृत्यु निश्चित है तो अनिश्चित क्या है? अनिश्चित है हमारा जीवन । इस अनिश्चित जीवन में हम सबकुछ निश्चित करना चाहते हैं और जो निश्चित है उसे हम भूला देते हैं। इसी कारण हम सब दुखी भी रहते हैं । मनुष्यों की बात करें तो जब बच्चे को जब पहला खिलौना मिलता है तभी से वो भेदभाव करना सिख जाता है। पहले हम सिखातें हैं कि ये तुम्हारा है फिर जब वो साझा नहीं करता है तो फिर से सिखाना पडता हैं कि अब साझा करो वो जो कि एक दूसरे के विपरीत है ।

बडा होते होते वो अपने धर्म के बारे में जानता है कि तुम्हारा धर्म है और फिर उसपर धर्म का लैपन किया जाता है जिससे दूसरों को पता चले इसका धर्म क्या है। जब उसे पता चलता है कि ये और वे अलग है, तब वो उन्हीं बच्चों की तरह खिलौनों के लिए लडते हैं। फिर हमें सिखाना पडता है मानवता का पाठ जो लिपे पुते इन्सानों को कतई समझ नहीं आता है।

नोट –: चूंकि लेखक मैं शब्द से परहेज करने लगा है इसलिए नाम लिखा है। नाम कोई भी लिख सकते हैं अगर उपरोक्त नाम पसंद न हो तो ।

अपना ध्यान “परम” सत्य पर केन्द्रित रखें

मैं इंजीनियरिंग का छात्र हूं और मैं सच्चाई और वास्तविकता को हर रिश्ते से ऊपर रखता हूं। मुझे एक बात समझ नहीं आती कि लोग मेरे पास सुझाव लेने क्यों आते हैं और जब कुछ गलत या उनके अनुसार नहीं होता तो वो मुझे ही दोष देते हैं.

हरि ओम, 23 वर्ष   मैं आपसे सहानुभूति रखते हुए एक बात कहना चाहता हूं. यह एक अनुभविक सत्य है कि कभी किसी को मुफ्त की राय या सुझाव नहीं देने चाहिए। इस दुनिया में सुझाव ही एकमात्र ऐसी चीज है जो हम बड़ी ही दरियादिली के साथ मुफ्त में बांटते हैं, लेकिन जो उस सुझाव को ग्रहण करता है वह उसे कभी समझ नहीं पाता। इसलिए आप कोई अकेले ऐसे इंसान नहीं हैं जिसके साथ ऐसा हुआ। वैसे भी किसी और को अपने साथ होने वाली घटनाओं के लिए दोषी ठहराना बहुत सहज भी है।  मान लीजिए आप किसी विपरीत स्थिति का सामना कर रहे हैं, आपको किसी की मदद, किसी के सुझाव की आवश्यकता है ताकि जो विनाश हो रहा है उसे नियंत्रित किया जा सके। ऐसे हालातों में आप क्या करेंगे?  कुछ लोग असफलता का परित्याग नहीं करते, जबकि उन्हें अनुकूल या नतीजों को ग्रहण करना आना चाहिए। परंतु जब समस्या बेहतरीन तरीके से सुलझ जाती है तो वे उसका क्रेडिट लेने लगते है। स्वार्थ सिद्धि हर व्यक्ति के दिमाग पर हावी रहती है और यह बेहद प्रासांगिक सत्य है। सलाह देना तभी फायदेमंद होता है, जब किसी को वाकई उसकी आवश्यकता हो और वह पूरी तन्मयता के साथ उसे ग्रहण का इच्छुक भी हो। अगर आपकी जॉब ही सलाहकार की है तो वह सलाह आपको अपने जॉब के दायरे में रहकर ही देनी चाहिए। फ्री की एडवाइस या सुझाव देना आपके लिए कदापि सही नहीं होगा।  एक समय बाद यह आदत बन जाती है.

जिसके परिणामस्वरूप हम दूसरों के जीवन में अपना हस्तक्षेप बढ़ा देते हैं।    बहुत  से लोगों का अहम इससे शांत होता है. उन्हें लगता है. क्योंकि सुझाव देने से आप स्वयं को उनसे बड़ा आंक लेते हैं. और आपको यह लगने लगता है कि किसी ना किसी रूप में आपको उनके जीवन का नियंत्रण प्राप्त हो गया है।  आपको अपना ध्यान परम सत्य या सर्वोच्च सत्य पर रखना चाहिए  .

  क्योंकि इस भौतिक दुनिया के सत्य हमेशा बदलते हैं. उसके कई संस्करण या रुपांतर भी होते हैं। लेकिन वह सर्वोच्च सत्य एक ही है. जिसे कभी बदला नहीं जा सकता।   .

ॐ के विज्ञान से जीवन के अन्तर्नाद को कैसे जगायें ?

दुनिया में धन की कमी, पदार्थों की कमी, वैभव की कमी को व्यक्ति कितना भी पूरा कर ले, फिर भी उसे लगेगा कि मैं किसी न किसी चीज से पीछे हूँ। अतृप्ति व अभाव से भरा हूँ। इसका कारण है व्यक्ति की पकड़ पदार्थों तक होता, इसलिए हम उस अतृप्ति को पदार्थ के बीच खोजने की कोशिश करते हैं। पदार्थों के बीच सुख, चैन, आनन्द, प्रेम, खुशी और शक्ति आदि सब पाना चाहते हैं, पर यह सब सम्भव है पूर्णता के साथ जुड़ने पर ही।
जैसे दीपक जलाते हैं तो उसकी लौ सदैव सूर्य की दिशा में रहती है, स्थूल पदार्थ सदा पृथ्वी की ओर भागता है। ठीक इसी प्रकार जीवन भी पूर्णता के लिए छटपटाता रहता है।
पर इसकी पूर्णता के लिए ज्ञान चाहिये, तत्व ज्ञान। सच्चा ज्ञान। सच्ची साधना चाहिये, जिससे आत्मा बलिष्ठ हो सके। चाहिये तप, जिससे अपने अंदर पड़े हुए जन्मों के पाप बीजों को जलाने की हिम्मत पैदा कर सकें। उपासना चाहिये, जिससे आत्मिक शक्ति बढ़ सके और ब्रह्मकवच प्राप्त हो। इसी के लिए हमें भक्ति, कर्म व ज्ञान तीनों की फिलॉसॉफी समझनी होगी। वास्तव में जो भी कर्म हम कर रहे होते हैं, उसे कहते हैं क्रियमाण कर्म, जो कर्म करने के बाद खाते में जमा होता है उसे कहते हैं ‘‘संचित डिपॉजिट’’ और जो डिपॉजिट किया हुआ है, वह जब पक जाता है, तब बनता है किस्मत। किस्मत जिसे बदलने हेतु भगवान भी दखलन्दाजी नहीं करते। किस्मत का लिखा तो भोगना ही पड़ता है। लेकिन जो जमा पूंजी है, अभी पकी नहीं, उसको तपस्या से, साधना से जला सकते हैं। ओंकार की चेतना इसी स्थान पर काम करती है। कोई उसे ध्यान में स्थापित करता है, कोई नाद में, कोई संकल्प में ओंम शक्ति को धारण कर परमात्मा की ओर अर्थात् पूर्णता के नजदीक जाने का पुरुषार्थ करता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं साधना के मार्ग पर चलते-चलते यदि किसी भक्त की मृत्यु हो जाती है, तो जहां उसकी साधना छूटती है, अगले जन्म में भगवान उसे वहीं से पकड़कर ले चलते हैं। शास्त्रगत है कि साधना करते शरीर छूट गया तो उसका अगला जन्म ऐसे धर्मात्मा परिवार में होगा, जहां माता-पिता, धन-सम्पदा से भरे पूरे होने के साथ ही उनके संस्कार भी भक्ति पूर्ण होंगे, जीव की भक्ति और साधना में कोई विघ्न-बाधा न डाले, इसका भी प्रबंध होगा। उसी स्तर के गुरु भी आसानी से मिल जाएंगे और यात्र आगे बढ़ जायेगी।

इसलिए जरूरी है हम भगवान की भक्ति की तरफ चलें, ब्रह्म यात्री बनें, कल्याणमार्ग के पथिक बनें। घर की जिम्मेदारियां निभाते, अर्ज व फर्ज निभाते हुए आगे बढ़ें। जीवन से जुड़े फर्ज निभाते हुए भगवान की उपासना की नियमितता बनाये रखें है। प्रार्थना की अनेक विधियां हैं, मंत्रजप, ध्यान, सिमरन आदि। पर महत्वपूर्ण है ओंकार ध्यान, जप व ओंकार उच्चारण।

अर्थात् 15-20 मिनट का ओंकार ध्यान रोज करें, जिंदगी में इसी ओंकार जप, ध्यान, उच्चारण से बहुत बड़ा परिवर्तन आयेगा।

कण-कण में गूंज रही है। इसी ध्वनि को हम विविध तत्व रूपों में सुन सकते हैं। वह मंदिर के घंटे में हो या शंख बजाने के बाद उभरती गूंज में अथवा आसमान में बादलों के बीज से गरजती आवाज, समुद्र की लहरों से उठती आवाज हमारे मंद व दीर्घ उच्चारण, गीत-संगीत आदि की आत्मा मूल में समाई धुन हो। ओंम की ही गूंज सबमें निहित है। यही अनदह नाद है जो सारी दुनिया में सब जगह गूंज रहा है। कभी हम अपने अंदर की आवाज सुने तो सनननन———की यह ध्वनि आेंकार ही है। मंत्रें द्वारा हम इसी धुन को आत्मसात करते हैं। मंत्र में शक्ति भी सिर्फ ओंकार के कारण पड़ती है। प्रत्येक मंत्र में इसीलिए ‘‘ओ३म्’’ लगाकर मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

भगवान ने ओंकार हमारे चेहरे व हर अंग पर लिख रखा है। नाक और आंखें ‘‘ओ३म्’’ आकार में ही हैं। इस तरह से बना हुआ नासिका, ओठ, अंदर का मुख भी ओम के आकार में है। पूरा शरीर ही ओंकार का स्वरूप है। ध्यान में ओंकार की ध्वनि को मंद-मंद सुनना ही अन्तर्नाद है। इसलिए सभी मतों, पंथों, सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में ओंकार प्रतिष्ठित है। सिख पंथ श्रद्धापूर्वक ओंकार सतनाम का उच्चारण करता है। जैन साधु सम्प्रदाय नमोकार उच्चारण बोलते हैं। ओम् नमो सिद्धणाम, नमो अरिहन्ताणाम् आदि सबमें ओंकार लगाकार उच्चारण किया जाता है।

बौद्ध ‘‘ओम् नमो पद मे ओम्’’ का उच्चारण करते हैं। मुसलमान या क्रिश्चियन में सीधा ओम् नहीं है, लेकिन वैसी ही एक मिलती जुलती ध्वनि है ‘‘आमीन’’ और क्रिश्चियन ‘‘आमेन’’ है। इसी ध्वनि से योगी ध्यान करते हैं। सच कहें तो ओंकार ही हमारे चारों ओर विद्यमान है। इसीलिए कहते हैं

‘‘ओम्कारं बिन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः, कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमो नमः।।’’
अर्थात् ओंमकार बिन्दु पर ध्यान से, इस ध्वनि का उच्चारण करने से योगी परमेश्वर को प्राप्त करते हैं। यही ध्वनि है जो कामनाओं को पूर्ण करती है और मुक्ति प्रदान करती है, सम्पूर्ण दुखों को दूर करती है। आइये! हम भी ओंकार गूंज को आत्मसात करें और जीवन को धन्य बनायें।